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अमृता प्रीतम की कविताओं और सिनेमाई गितो से लेकर आज की जन-ज़ी (Gen-Z) के इंस्टाग्राम रील्स तक में छाई ‘लौंग’ अमृतसर के स्वर्णा कारोबार में अलग पहचान बन चुकी है। छोटी सी दिखने वाली लौंग जब किसी युवती नाक में पहनी जाती है तो उसकी खूबसूरती को ठीक उसी तरह चार चांद लगा देती है जैसे चांद के बलग में छोटा सा सितारा। महिलाओं के लए लोक प्रिय आभूषण को बनाने में हजारों कारिगरों कारिगर जुटे रहते हैं। सुल्तानविंड रोड और गुरु बाजार की गलियों में जब सोने के छोटे से टुकड़े को आकार देते देते हैं तो मन बरबस ही कह उठता है -निगां मार निग आए मेरा लौंग गवांचा....
दुर्गेश मिश्र, अमृतसर
परंपरा जब आधुनिक फैशन से हाथ मिलाती
है, तो संस्कृति के साथ-साथ रोजगार के नए
रास्ते भी खुलते हैं। अमृतसर का 'नाक की
लौंग' उद्योग इसका सबसे सटीक उदाहरण है।
पारंपरिक रूप से सुहाग और श्रृंगार का प्रतीक मानी जाने वाली लौंग, आज युवाओं के लिए एक कूल 'फैशन स्टेटमेंट' बन
चुकी है। अमृतसर में तैयार होने वाली बारीक़ और डिजाइनर लौंग की मांग देश-विदेश
में तेजी से बढ़ी है।
एक आभूषण नहीं, बल्कि एक अहसास भी है। कभी कुछ गिने-चुने
कारीगरों तक सीमित रहने वाला यह हुनर आज एक बड़े घरेलू उद्योग का रूप ले चुका है,
जिसने न केवल शहर के हजारों परिवारों को सम्मानजनक रोजगार दिया है,
बल्कि अमृतसर को देश के फैशन मैप पर एक नया चमकीला केंद्र बना दिया
है। आइए जानते हैं कि कैसे अमृतसर की तंग गलियों में ढलने वाली यह छोटी सी लौंग,
आज के आधुनिक फैशन और स्थानीय अर्थव्यवस्था की बड़ी रीढ़ बन रही है।
स्वर्णकार संघ
पंजाब के वाइस प्रेसिडेंट रविकांत कहते हैं, लौंग (नोज पिन) फैशन ही यह हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और सिनेमाई पहचान भी है। वे कहते हैं कि लौंग हर उम्र की महिला पहनती
है। चाहे वह पांच साल की बच्ची हो या उम्र
के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुकी महिला। सभी पहनती हैं क्योंकि यह हमारी भारतीय
संस्कृति है। रविकांत कहते हैं वैसे भी
स्वर्णआभूषणों के लिए अमृतसर जाना जाता, लेकिन लौंग उद्योग
ने अमृतसर को राष्ट्रीय और अंरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
इसी तरह आल इंडिया
स्वर्णकार संघ के प्रेसिडेंट जसपाल चौहान कहते हैं , केवल नोज पिन ही नहीं, कान की बाली,
कुंड, झाला और कील उद्योग में अमृतर चमका है ।
इसका वार्षिक कारोबार अच्छाखासा होता है।
अब तो युवा भी कानों में कील जो लौंग जैसी ही होती है पहनने लगे हैं। वे कहते हैं कि इस उद्योग में पहले जयपुर,
आगरा और वाराणसी की कारिगरी को पसंद किया जाता था, लेकिन पिछले कई सालों से अमृतसर के लौग उद्योग ने अपना दबदबा कायम रखा है।
कुटिर उद्योग, अलग-अलग जगहों पर बनते हैं पार्ट्स
रविकांत कहते हैं, लौग बनाने का काम पूरी तरह से दस्तकारी का काम है। इसमें मशीनी ना के बराबर या होता ही नहीं है। यह पूरी तरह से कुटिर उद्योग की श्रेणी में आता है। छोटी सी दिखने वाली लौंग के कई पार्ट्स होते हैं जो अलग-अलग जगहों पर बनते हैं, फिर इसे एकत्र कर के जोड़ा जाता है। फिर इसे पालिश और फिनिंग करे मार्केट में भेजा जाता है। इसका काम घर-घर में होता है। वे कहते हैं, परंपराओं के अलावा युवा पीढ़ी में नाक छिदवाना और लौंग पहनना फैशन बन गया है जिसकी वजह से इसकी मांग में इजाफा हुआ है।
हर तीसरे घर में होता है काम
प्रेसिडेंट जसपाल चौहान कहते हैं, गुरु नगरी में नोजपिन का सबसे ज्यादा उत्पादन सुल्तानविंड रोड पर होता है। वे कहते हैं यहां हर तिसरे घर में एक कारिगर जरूर मिलेगा जो लौंग बनाने का काम कर रहा होता है। लौंग के छोटे-छोटे पुर्जे होते हैं जिनपर बारिक काम होता है। इस काम में ज्यादातर महिलाएं सहयोग करती हैं। अमृतसर में हर तरह की नोजपिन बनती है। पंजाब डिजाइन के अलावा मांग के हिसाब से भी डिजाइन तैयार होते हैं। वैसे तो सर्राफा के लिए प्रसिद्ध गुरु बाजार, दुर्ग्याणा मंदिर के आसपास, बेरीगेट के आसपास सहित अन्य स्थानों पर भी काम होता है। लौंग में स्क्रू तैयार करने का काम ज्यादतर महिलाएं करती हैं । ये उनका पार्ट टाइम काम होता है।
बंगाली और स्थानीय कारिगर भी तराशते हैं लौंग
लौंग उद्योग से जुड़ एक अन्य स्वर्णकार ने बताया कि महिलाओं की पहली पसंद लौंग को बनाने और तराशने में स्थानीय कारिगरों के अलावा बंगालरी और गुजराती कारीगर भी होते हैं। इनमें महिलाएं भी साशिल हैं। वे कहते हैं लौंग उद्योग से जुड़ कारिगरों के लिए कोई एक कारखाना नहीं होता, बल्कि ये लोग रा मेटेरियल ले जाते हैं और से अपने घर से ही तैयार करते के लाते हैं। वे कहते हैं, पहले यहां सोने-चांदी के ही लौंग तैयार किए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ग्राहकों के मांग के अनुसार आर्टिफिसियल लौंग भी तैयार की जाने लगी है।
गुजरात और बंगाल में भारी डिमांड
लौंग उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अमृतसरी लौंग की तो पूरे पंजाब में डिमांड तो है ही इसके अलावा देश भर में लौंग की आपूर्ति होती है। मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा , उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल में इसकी अच्छी मांग है। यह बात लगह है कि प्रधान मंत्री की सोना न खरीदने की अपील कुछ असर इस उद्योग पर पड़ा। उत्पदान की अपेक्षा मांग में कुछ गिरावट आई है।
मशीनों से नहीं हाथाें से होता है काम
रविकांत कहते हैं लौंग बनाने का सारा काम हैंडमेड है। डाई कटिंग, जोड़ा, कलर, छिलाई, नग लगाई सहित अन्य सारे काम हाथ से होते हैं। वे कहते हैं अब तो बदलते समय के साथ-साथ नोजरिंग भी तैयार किया जाने लगा है। नोज पिन भी दो तहर की होती हैं—एक सीधी डंडी वाली जिसमें अंत में स्क्रू लगा होता है जिससे नोज स्टड अपनी जगह पर टिकी रहती है, और दूसरी जिसमें तार नाक के अंदर मुड़ा हुआ होता है। दिखने में दोनों लगभग एक जैसी होती हैं, लेकिन इनमें से किसी एक को चुनना यह ग्राहक पर निर्भर करता है।
सभी तरह के डिजाइन तैयार होते हैं अमृतसर में
जसपाल चौहान कहते हैं यदि पारंपरिक डिजाइन की बात करें तो इनमें अमृतसरी लौग, मराठी, राजस्थानी, पंजाबी और गुजराती स्टाइल शामिल है। यदि आधुनिक और ट्रेंडी डिजाइन की बात करें तो सिंगल स्टोन, फ्लोरल, लीफ, स्टार या बर्ड शेप्स, मल्टी स्टोन आदि शामिल हैं। बाकी आर्डर के अनुरूप सोने या चांदी की सतह पर जड़े हुए हीरे (डायमंड), कुंदन, और रंगीन नग का भी काम किया जाता है।
फिक्स वेतन की जगह दिहाड़ी पर होता है काम
स्वर्णकार संघ के पदाधिकारियों के अनुसार लौंग उद्योग से जुड़े कारिगर वेतनभोगी नहीं, बल्कि दिहाड़ीदार होते हैं। इन्हें तय मानक के अनुसार मजदूरी दी जाती है। जो कुशल और अकुशल कारिगरों के लिए अलग-अलग तय होती है। रविकांत बताते हैं कि इस काम में करीब 60 से 70 हजार लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। वे कहते हैं एक वर्ष में 30 से 40 किलो लौंग तैयार हो जाती है। वहीं जसपाल चौहान कहते हैं, यह कोई फिक्स पैमाना नहीं है, यह आंकड़ा मांग के अनुसार घटता बढ़ता रहता है।