दीवार  पर टंगे विभाजन के दस्‍तावेज

दुर्गेश मिश्र
देश के विभाजन को 70 बरस से अधिक का समय होने को हैए लेकिन इसकी यादें विस्‍थापन का दंश झेलने वालों के जहन में आज भी ताजा है। अखंड भारत के नक्‍शे पर अगस्‍त 1947 में खिची विभाजन की रेखा ने न केवल एक नए मुल्‍क पाकिस्‍तान को जन्‍म दिया बल्कि हराजों लाखों लोगों के दिलों को पर वो गहरा जख्‍म दिया जिसके दाग आज भी देखे जा सकते हैं। 14 अप्रैल को बैसाखी के दिन अम़तसर स्थित श्री दरबार सहिब में श्री गुरुग्रंथ साहिब के दर्शन करने आए 85 दिल्‍ली निवासी रामलाल की आंखे छलछला आईं। अपने परिजनों के साथ जलियांवाला बाग में शहीदों को नमन करने के बाद वह टाउनहाल स्थित पार्टिशन म्‍यूजियम को देख रहे थेए कि अचानक कमरा नंबर दो में उनके पांव थम गए। बच्‍चों ने पूछा क्‍या हुआ। रामलाल कुछ बोल नही पा रहे थेए बच्‍चों ने फिर पूछा क्‍या हुआ। इस बार रामलाल अपने को संभाल न सके और फूटश्फूट कर रोने लगे। म्‍यूजियम में आए अन्‍य लोग उन्‍हे आवाक देखने लगेए किसी को कुछ समझ नहीं आया कि अचानक इस बुजुर्ग के साथ ऐसा क्‍या हुआ कि वह रोने लगा। म्‍यूजियम के गार्ड ने पानी लाया। दो घूंट पानी पीने के बाद जब रामलाल संभले तो म्‍यूजियम में लगी एक बड़ी सी तस्‍वीर की तरफ ईशारा किया। इस तस्‍वीर में लोगों से ठसाठस भरी रेलगाड़ी किसी प्‍लेट फार्म पर खड़़ी थी। रामलाल ने बताया कि इसी तरह की रेलगाड़़ी से उनका परिवार गुजरांवाला से अम2तसर आया था। लेकिन अब उनकी यह मात़भूमि अब सरहद के उस पार पाकिस्‍तान में है। रामलाल ने बताया कि किस तरह उनका परिवार अपना सबकुछ छोड़ कर मात्र कुछ पकडों के साथ बलवाइयों से बचते बचाते इसी तरह की गाड़ी में बैठक कर अम़़़़तसर स्‍टेशन तक पहुंचे थे। बटवारे के इस गदर में उनकी दो साल की छोटी बहन व छोटे चाचा की मौत होई। अम़तसर के खालसा कालेज में बने रिफ़यूजी कैंप में कुछ माह रहने के बाद फिर उनका परिवार दिल्‍ली चला गया और वहीं बस गया। वे कहते हैं उन्‍हें आज भी याद है अब्‍दुल चाचा उनके पड़ोसी हुआ करते थे। गांव में चौपाल थी जहां वे और हमउम्र गांव के बच्‍चे खेला करते थे। आज भी वो गलियां और वह तलाब याद है। लेकिन बटवारें ने सबकुछ छीन लिया। यह दर्द अकेले रामलाल का नहीं हैए बल्कि उनके जैसे हजारों लाेग हैं जिन्‍हों ने यह मंजर देखा है। भातर विभाजन में अपना सबकुछ गंवाने वाले लोगों के संम्‍मान में यह म्‍यूजियम स्‍थापित की गई है।

दुनिया की पहली म्यूजियम: 


द आट्र्स एंड कल्चरल हैरिटेज टस्ट नई दिल्ली की सीईओ मल्लिका आहलुवालिया का दावा है कि अमृतसर में अंग्रेजों द्वारा 1866 में प्रशासनिक गतिविधियों को चलाने के बनवाए गए टाउन हाॅल में केंद्र व राज्य सरकार की पहल पर 17000 स्वायर फुट में बना यह म्यूजियम दुनिया का पहला ऐसा संग्रहालय है, जिसमें विभाजन की त्रासदी को दिखाया गया है! आहलुवालिया कहती हैं कि यह विश्व इतिहास में पहली ऐसी घटना है जिससे करोड़ोलोग प्रभावित हुए। और इतने ही लोगों की अदला बदली हुई। भारत के इस विभाजन से पांच लाख से अधिक लोग मारे गए और बेघर हुए। सालों को तक तंबूओं में रिफ्यूजी का जीवन जीना पड़ा था। सो ऐसे में यह लाजमी होता है कि विभाजन के इस इतिहास से भावी पीढ़ी के लोगों को रूबरू करवाया जाए।

इन्हों ने देखा म्यूजियम बनाने का सपना

पार्टीशन म्यूजियम के अस्तीत्व में आने के सवाल पर संस्था की सीईओ कहती हैं कि विस्थापन का दर्द झेल चुके लोगों की लंबे समय से इच्छा थी नई पीढ़ी को राजनीति क महात्वा कांक्षा केलिए अखंड भारत के के नक्शेपर खीची गई विभाजन की लकीर और उससे उत्पन्न हुए हालात से अवगत करवाने के लिए एक संग्रहाल का होना जरूरी है। जिसमें विभाजन से जुड़े दस्तावेजों को संजोया जाए। इस ख्याल को साकार करने के लिए प्रसिद्ध फिल्मकार महेश भट्ट, शायर गुलजार, प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर, प्रसिद्ध उद्योगपति व हीरो साइकिल के संस्थापक बृजमोहन मुंजाल, किश्वर देसाई सहित कई अन्य लोग जोपाकिस्तान के अस्तीत्व में आने के बाद वहां से बेघर होकर सरहद के इसपार आए और जिंदगी के जद्दो जहद में विश्वपटल पर फिर से अपनी पहचान स्थापित की ने, अपना योगदान दिया। और इनके अथक प्रयास के बाद लगभग दो साल पहले यह पार्टीशन म्यूजियम अस्तीत्व में आया।

अमृतसर में ही क्यों बना म्यूजियम

इस सवाल के जवाब में मैडम आहलूवालिया कहती हैं जब देश का विभाजन हुआ उस समय पंजाब और बंगाल का हिस्सा काफी प्रभावित हुआ था। लोगों का कत्लेआम भी इन्हीं दो हिस्सों में सबसे ज्यादा हुआ। जिसमें पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। रिफ्यूजी कैंप भी पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, गुजरात और राजस्थान में बनाए थे, लेकिन अमृतसर के टाउन हाल में इस म्यूजियम को बनानेका मकसद यह था कि यह स्थान जलियांवाला बाग व गोल्डन टेंपल के बेहद करीब है। जो लोग यहां आएंगे वह इस म्यूजियम को देखना जरूर चाहेंगे। उन्होंनेबतायाकि इस तरह के म्यूजियम दिल्ली, कोलकाता, असम व गुजरात में बनाने की योजना है।

ये वस्तुएं हैं संग्रहित 

पार्टीशन म्यूजियम मेंबाउंडरी कमीशन की फाइल, उस समय के दुर्लभ चित्रों के अलावा गुलजार, श्यामबेनेगल, प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैय्यर, पंजाबी के प्रसिद्ध कवि सुरजित पातर की डाक्यूमेंटरी, अग्रंजी, हिंदी व उर्दू में लिखे खत, शरणर्थियों के लिए जारी किए गए पहचान पत्र, बृजमोहन मुंजाल की पत्नी संतोष मुंजाल की आत्मकथा की डाक्यूमेटरी जो उस समय पाकिस्तान के लायलपुर से पलायन कर भारत आए थे,  मथुरा, कानपुर, अमृसर, गुजरात, जयपुर व फिल्मकार गुरिंदर चड्ढा से मिले दस्तावेज व 15 अगस्त 1947 को प्रकाशित प्रकाशित समाचार पत्रों के अलावा एसएल परासर की पेंटिंग व प्रसून जोशी की पुस्तक सहित कईऐतिहासिक दस्तावे रखेहुए है। संस्था के सदस्यों का कहना है कि इसके अलावा पाकिस्तान के प्रसिद्ध अखबार डाॅन से भी संपर्क कर कुछ कागजातों को मंगवाया गया हैजो उनके पास मौजूद हैं।

बटावारे में भारत के हिस्से में आया था लाहौर

शायद ही किसी को पता होगा कि विभाजन के समय लाहौर भारत के हिस्से में था। म्यूजियम की मैनेजर राजविंद्र कौर का दावा है कि रेडक्लिफ जिन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच बाउन्डरी लाइन खिंची थी से बात चित में खुलासा किया था कि लाहौर पहले भारत के हिस्से में आ रहा था, लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि बटवारे में पाकिस्तान के हिस्से में एक भी ऐतिहासिक व संवृद्ध शहर नहीं आ रहा है, इसलिए लाहौर कोपाकिस्तान में ही रहने दिया जाए, ताकि पाकिस्तान को अपने पैरों पर खड़ा होने में कुछ मदद मिल जाएगा। जिन्ना के इस अनुरोध पर कुछ लनोगों के विरोध के बावजूद  गांधी जी के कहने पर तत्कालीन हुक्मरानों ने लाहौर को पाकिस्तान को देना मंजूर कर लिया और इस तरह लाहौर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

विभाजन से प्रभावित हुए थे एक करोड़ लोग 

15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को भारत से अलग हो कर एक नया राष्टर पाकिस्तान अस्तित्व में आया था। उस समय इस विभाजन से एक करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। विभाजन की इस हिंसा में पांच लाख से अधिक लोग मारे गए। 1.45 करोड़ लोग बहुमत संप्रदाय वाले देशों में शामिलए। पाकिस्तान में हिंदू-सिखों को जबरन बेघर कर दिया किया। उनकी महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसी घीनौना कार्य किया गया। विभाजन रेखा तय होने केबाद हिंसा के डर से एक करोड 45 लाख लोग सीमा पार किए। जानकारों के मुताकि 1951 विस्थापित गणना के अनुसार बटवारे के एकदम बाद 72,26,000 मुस्लमान भारत छोड़ पाकिस्तान गए और 72,49,000 हिंदू व सिंख पाकिस्तान छोड. भारत में आए। इनमें से 78 फीसद स्थानांतरण पश्चिम बंगाल व पंजाब में हुआ था।

ये हैं संस्था के सदस्य 

द आट्र्स एंड कल्चरल हेरीटेज टरस्ट के सदस्यों में किश्वर देसाई संस्था के चेयरैन, कुलदीप नैय्यर, दीपाली खन्ना, प्रसिद्ध डिजाइनर रितु, फिल्मकार महेश भट्ट की पत्नी सोनी राजदान व पिंकी आनंद आदि हैं। अमृतसर में बने इस पार्टिशन म्यूजियम में प्रवेश निःशुल्क हैऔर यह म्यूजियम पूरी तरह बिना किसी सरकारी सहायता के आम लोगों के डोनेशन पर चलती है। इस म्यूजियम में प्रतिदिन 300 से अधिक लोग देश विभाजन के चित्रों को देखने आते हैं।

तस्वीरों को देख रोपड़े महेश भट्ट :
पिछले दिनों फिल्म बेगम जान के प्रमोशन पर अपनी टीम निदेशक सरजीत मुखर्जी, अभिनेत्री गौहर खाने के साथ अमृतसर आए निर्माता निदेशक महेश भट्ट पार्टिशन म्यूजियम को देखते-देखते अचानक रो पड़े थे। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि विभाजन का दर्द, मुझसे, गुलजार साबह व मनोज कुमार जि से अधिक कौन जान सकता है।