जलियांवाला बाग : दिवारों में धंसी गोलियां 107 साल बाद भी दे रहीं बर्बरता की गवाही

अमृतसर के जलियांवालाबाग (Jallianwala Bagh) में 13 अप्रैल सन 1919 में जनलर डायर के हुक्म पर ब्रिटिश सैनिकों की तरफ के बाग में एकत्र लोगों पर चलाई गई गोलियों के दिवारों में पड़े निशान को देखते हुए लोग और बनाया गया शहीदी स्मारक। इस हत्याकांड की जांच पं. मदनमोहन मालवीय जी ने की थी, जिसमें 1300 लोग बलिदान हुए थे। शहीद हुए लोगों में  87 बच्चे भी शामिल थे। एक बच्चे की उम्र महज सात माह थी। फोटो :  सोर्स गुगल से साभार

देश की आजादी के बाद से इस वंदनीय स्थल में कई बदलाव किए गए।  हलांकि जलियांवाला बाग की वह गली, वहां स्थित मजार, शहीदी कुंआ और करीब 107 साल पहले दिवारों में धंसी असंख्य गोलियों के निशान हतिहास के बिखरे पन्नों को सहेजने में हमारी मदद करते हैं।  यह वह इतिहास के कीमती पन्ने हैं जो देश प्रेम के प्रति समर्पण का भाव जगाते हैं। 


दुर्गेश मिश्र, अमृतसर

अमृतसर की उस दोपहर में, जब बैसाखी का उत्सव पुरातन भारत की आस्था और परंपराओं से सराबोर था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि इतिहास अपने सबसे काले अक्षरों में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है। जलियांवाला बाग की मिट्टी सदियों से मेलों, सभाओं और साझा विरासत की गवाह रही थी—जहां लोकगीतों की धुन पर पुरखों की स्मृतियाँ सांस लेती थीं। पर 13 अप्रैल 1919 को यही धरती गोलियों की गूंज से कांप उठी, और परंपरा की शांत छाया पर अत्याचार की धूल जम गई।

उस दिन केवल निर्दोष लोगों का रक्त ही नहीं बहा, बल्कि एक सोई हुई चेतना भी जागी—एक ऐसा संकल्प, जिसने गुलामी की जंजीरों को चुनौती देने का साहस दिया। पुरातन भारत की सहनशील आत्मा आधुनिक भारत के विद्रोही स्वप्न में बदलने लगी।

आज, जब हम डिजिटल युग की चमकती स्क्रीन पर इतिहास पढ़ते हैं, तो जलियांवाला बाग की दीवारों में धंसी गोलियां हमें याद दिलाती हैं कि आधुनिक स्वतंत्रता की नींव पुरखों के बलिदान से बनी है। यह कहानी उसी पुल की है—जहां अतीत का दर्द वर्तमान की आज़ादी से संवाद करता है, और बताता है कि इतिहास केवल बीतता नहीं, वह हमारे आज में धड़कता भी है। आइए इसी जलियां वाले बाग के कल आज और कल के कुछ छितराए और कुछ सहेजे हुए पन्नों को पलटने की कोशिश करते हैं। 

जलियांवाला बाग नरसंहार क्यों हुआ

सन 1919 का वह दौर था जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा आजादी के लिए कसमसा रहा था। इस दरम्यान बर्तानवी हुकूमत ने 'रौलट एक्ट' पारित कर दिया।  यह अंग्रेजी सरकार का वह काला और क्रूर कानून था जिसके तहत किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाए जेल में डाला जा सकता था। यानी 'जज न मुंसफ, सीधे जेल' । इस कानून का देशभर में कड़ा विरोध हो रहा था। पंजाब में इस कानून का विरोध कर रहे डा. सैफूद्दीन किचलू और डा. सतपाल की गिरफ्तारी हो चुकी थी। जिसके विरोघ में अमृतसर में लोग जलियांवाला बाग में शांति पूर्ण सभा कर रहे थे। वह दिन था 13 अप्रैल।   13 अप्रैल खालसा पंथ का स्थापना दिवस भी है और बैसाखी भी।  इन दिनों महत्वपूर्ण त्योहारों के होने के वजह से लोग हरिमंदिर साहिब में स्नान दान करने आए थे।  आम दिनों की अपेक्षा उस दिन लोगों की भीड़ भी थी। इसमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे।  लोगाों को पता नहीं था कि जलियां वालाबाग में जलसा किस बात का है। और लोग उस सभा में शामिल हो गए। इसमें लहंदे पंजाब के लोग भी। 

कैसे मारे गए इतने लोग 

आज जिस स्वरूप में जलियांवाला बाग को देख रहे हैं, वह 107 साल पहले ऐसा नहीं था।  जलियांवाला बाग चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा था, जिसके अंदर आनने और बाहर जाने का एक ही रास्ता था और वह भी बहुत संकरा। इतिहास के सबसे स्याह अध्याय को ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने लिखा, जो पंजाब में विद्रोह को कुचलने और भारतीय जनमानस में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भय पैदा करना चाहता।  सैनिकों के साथ पहुंचे जनरल डायर ने जलियांवाला बाग के मुख्य द्वार को बंद कर दिया। और बिना किसी पूर्व चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का हुक्म जारी कर दिया। 

गोलियां खत्म होने तक गरजती रहीं बंदूकें

सार्वजनिक हुई जांच रिर्पोटों और तत्कालीन पत्र -पत्रिकाओं में छपी खबरों के मुताबिक डायर का हुक्म मिलते ही सैनिकों ने जलसे में मौजूद लोगों पर सीधे फायर खोल दिया। कहा जाता है कि गोलियां करीब 10 मिनट तक चलती रहीं, यानि ब्रिटिश सैनिकों की बंदूकें तब तक गरजीं जब तक गोलियां खत्म नहीं हो गई। यदि आधिकारिक आंकड़ों की बात करें तो 379 लोगों की मौत हुई थी, इनमें एक बच्चा भी शामिल था। लेकिन, अनौपचारिक आंकड़ों के मुताबिक 1,000 से अधिक लोग मारे गए और1,500 से अधिक लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे।  इस बर्बाता गवाही जलियांवाला बाग की दिवारों में धंसी गोलियों के निशान और वह कुंआ आज भी देते हैं जिसमें जान बचाने के लिए लोग कूदे और शहीद हो गए। 


जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच करने पहुंचे पं. मदनमोहन मालयवीय जी (मध्य सफेद धोती-कुर्ते में) अन्य लोग दिवारों में धंसी गोलियों के निशान देखते हुए। फोटो सोर्स : साभार गुगल से

पं. मदन मोहन मालवीय ने की जांच

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार पं. मदन मोहन मालवीय जी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच न की होती शायद अंग्रेजी सरकार इस जघन्य हत्याकांड को छिपा गई होती।  मालीवय जी ने बीएचयू (बनारस हिंदू विश्व विद्यालय) के कुलपति का पद छोड़ कर करीब सात माह तक अमृतसर की गलियों में लियांवाला बाग हत्याकांड के साक्ष्य तलाशते रहे ताकि अंग्रेजों की काली करतूतों को उजागर किया जा सके। जघन्य हत्याकांड पर लीपापोती के ब्रिटिश सरकार ने हंटर कमीशन बनाया, जिसकी रिपोर्ट के अनुसार कमीशन ने मात्र 379 मौतों और एक हजार घायल की रिपोर्ट दी।  हालांकि, मालवीय की रिपोर्ट के अनुसार, 1300 लोग मारे गए। और दो हजार से अधिक घायल हुए, जिसमें 42 बच्चे भी शामिल थे। इसमें से एक बच्चा महज सात महीने का था। मारे गए लोग 57 गांवों के निवासी थे। ब्रिटिश रिपोर्ट के अनुसार, एक मैदान में 15 हजार लोग अंग्रेजी सरकार के खिलाफ मुहिम छेड़ने के लिए आए थे तो वहीं मालवीय जी की रिपोर्ट के मुताबिक उस दिन वैशाखी का पर्व था और लोग इसे मनाने के लिए जुटे थे। इसी रिपोर्ट के आधार पर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की घोषणा कर दी।


जलियांवाला बाग के प्रवेश द्वार पर लगी शहीद उधम सिंह की प्रतिमा। 


जलियांवाला बाग की ज्वाला थे उधम सिंह

कहा जाता है कि जब जलियां वाला बाग हत्याकांड हुआ उस समय उस समय उधम सिंह वहां मौजूद थे, जिन्होंने इस घटना को अपनी आंखों से देखा था। यतीम खाना के प्रबंधकों के अनुसार उधम सिंह अनाथ थे और उनकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश चीफ खालसा दिवान के तहत संचालित यतीम खाने में हो रही थी।  जिस दिन जलियांवाला बाग की घटना हुई उस दिन किशोर उम्र के उधम वहां जलसे में लोगों को पानी पिलाने की सेवा निभा रहे थे।  इस घटना ने उनके मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि वह 1940 में लंदन में जाकर माइकल ओ'डायर को गोली मारी थी । बलिदानी उधम सिंह अस्थियां आज भी जलियांवाला बाग के म्यूजियम में एक कलश में रखी हुईं हैं। 

लौटाई नाइट हुड की उपाधी

डा: ब्रह्मानंद सिंह कहते हैं कि 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग की घटना से आहत गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने 31 मई, 1919 को अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। यह उपाधि उन्हें साहित्य के नोबेल पुरस्कार मिलने के दो साल बाद 1915 अंग्रेजों द्वारा दिया गया था।  यह नहीं उन्हें उम्मीद थी कि अमृतसर में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन में महात्मागांधी जलियांवाला बाग हत्याकांड की निंदा करेंगे लेकिन ऐसा न किए जाने पर वह इतने दुखी हुए कि ‘एकला चलो रहे’ कहते हुए कांग्रेस से अलग हो गए।


जलियांवाला बाग पर लिखी गई पुस्तक। साभार गुगल से

लेखकों ने क्रांति को दी धार

साहित्यकार रामबदन राय कहते हैं कि  अगर लेखकों की बात करें तो उन्होंने भी अपनी लेखनी से क्रांति को धार दी। जलियांवाला बाग की घटना से आहत नानक सिंह ने ‘खून बैसाखी’ नाम से गुरुमुखी में कविता लिखी। यह कविता उस समय के सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांतों में से एक है, जिसे 1919 में प्रकाशित होने के तुरंत बाद ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया था। इसके अलावा राम स्वरूप गुता ने ‘बाग-ए-जलियांवाला’ गीत संग्रह लिखा, जलियांवाला बाग की पीड़ा को व्यक्त करते हुए फिरोजुद्दीन शरफ ‘जलियांवाला बाग’ लिखा। इसी तरह  'पंजाब का हत्याकांड' (उर्दू नाटक) और 'जलियांवाला बाग' (गुजराती नाटक) लिखा गया। अंग्रेजों के दमन इतना खौफ था कि इन दोनों पुस्तकों के लेखनों ने अपना नाम नहीं लिखा। इस तरह रतन देवी की गवाही भी रही। रतन देवी ने उस रात जलियांवाला बाग में शवों के पास बिताया । जो बाद में प्रतिबंधों की सूची में शामिल कर दिया। इसके अलावा सआदत हशन मंटों ने ‘ तमाशा’ नाम की कहानी लिखी, जो जलियांवाला बाग की घटना पर आधारित थी। 

पांच लाख में बना शहीदी स्मारक

प्रो: दरबारी लाल कहते हैं कि भारतीयों की दृढ़ इच्छाशक्ति और असंख्य बलिदान के बाद जब देश आजा हुआ तो पं. मदन मोहन मालवीय के परामर्श पर जिसे उन्हों अपनी जांच रिपोर्ट में दी थी के आधार पर स्मारक बनाने का फैसला लिया गया। देश की स्वतंत्रता के बाद जलियांवाला बाग को उनके असल मालिकों से 5लाख रुपये में खरीद कर स्मारक बनाया गया। इस शहीदी स्मारक की डिजाइन अमेरिकी वास्तुकार बेंजामिनन पोल्क द्वारा तैयार किया गया। इस स्मारक का लोकार्पण 1961 में देश प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल द्वारा किया गया।  

जलियां वाला बाग पर बन चुकी हैं फिल्में

देश की आजादी में प्राणों का उत्सर्ग करने वाले बलिदालियों से लोगों को रूबरू करवाने में हमरे फिल्मकार भी पीछे नहीं रहे। जलियां वाला बाग हत्याकांड पर कई फिल्में बनीं जिनमें प्रमुख हैं- सरदार उधम सिंह, गांधी, रंग दे बसंती, फिल्लौरी, द लीजेंड आफ भगत सिंह, शहीद, जलियांवाला बाग और केसरी चैप्टर-2 आदि हैं। 

...और आज बना पर्यटन स्थल

जलियांवाला बाग की घटना को 107 हो चुके हैं।  इस वंदनीय स्थल की चंदन सरीखी माटी को माथे पर लगाने के लिए देश के कोने से सैकड़ों लोग प्रति आते हैं। महाराष्ट्र के अहिल्याबाई नगर से आए दीपक कांबले, सतारा से आए सिनेमेटोग्राफर एवी आवा मस्करे, गुजरात के भाव नगर के धीरू भाई और अहमद कुरैशी, वाराणी राम नगीना कहते हैं कि उन्होंने इस घटना का किताबों में ही पढ़ा लेकिन आज शहीदों के रक्त से सिंचित इस स्थल को सामने देख रहे हैं।  इसमे बनाए गए भितिचित्र और म्यूजियम शहीदों की शहादत से रूबरू करवाते हुए देश सेवा के लिए प्रेरित कर रहा है।