रोजगार दिलाता पान
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| पान के पत्तों की तुडाई करता काश्तकार। |
भारतीय लोक
संस्कृति में रचा-बसा पान हिंदुस्तानी समाज में कबसे शुरू हुआ, यह तो ठीक
से नहीं कहा जा सकता। मगर इतना जरूर कहा जाता सकता है कि इसका प्रचनलन
वैदिक काल से ही माना जाता है। इस काल में पान पाप निवारक, सावित्क व एंव
शुद्धता का प्रतीक तो था ही, बल्कि कालांतर में इसे सम्मान, समृद्धि एवं
शौर्य का सूचक भी माना जाता था। धार्मिक कर्मकांडो, मंगल कार्यों, अतिथि
सत्कार एवं साहसिक कार्यों में पान के पत्ते एवं पान के बीड़े की अपनी अलग
ही पहचान व परंपरा ही है। लेकिन यह परंपरावादी पान आज हिंदुस्तान के करोड़ो
बेरोजागर लोगों के लिए रोजगार व आजीविका का साधन बना हुआ है। यही नहीं इसके
व्यापार से देश को करोड़ो का राजस्व भी मिल रहा है।
लोक गीतों
से लेकर नई-पुरानी फिल्मों के गानों में, मुजरा करनेवाली तवायफो, शायरों व
कव्वालों की महफिलों, शुभ समारोहों व धर्मस्थलों पर अलग-अलग तरह से प्रयोग
किया जाने वाला पान आज देश के हर गली, चैक व मोड़ पर सुगमता से प्राप्त हो
जाता है । भारत भूमि पर जन्म लेकर इसने समस्त विश्व पर प्रभुत्व स्थापित कर
लिया है। यह विश्वस्तर पर सब्जियों के बाद खाई जाने वाली वनस्पतियों में
पहले स्थान पर आता है। यह लोगों को जितनी सुगमता से हासिल हो जाता है, इसको
उगाना उतना ही कठिन व जटिल होता है। हलांकि अब पान का कारोबार काफी बढ़
चुका है । यहां तक इस का निर्यात पाकिस्तान सहित अन्य देशों में भी किया
जाता है। और तो और इसके बागवानी के लिए के जिला डद्यान विभाग की ओर से
किसानों को प्रोत्साहित व प्रशिक्षित भी किया जाता है।
एक पान कई नाम
देखने
में पीपल या गिलोय के पत्तों सरीखा लगने वाला पाना कई नामों- जैसे संस्कृत
में नाग वल्ली, ताम्बूल, बंागली में पान, मराठी में पान-बिड़याचैपान,
गुजरातती में नागरबेल, तेलगु में तमलपाक, कन्नड़ में विलयादेले, मलयालम में
बेल्लिम और हिंदी पान या ताम्बूली आदि नामों से जाना जाने वाला यह पान
वानस्पतिक भार्षा में ‘ पाईपर बीटल’ कहा जाता है।
धार्मिक आधार
एक
धार्मिक कथा के आधार पर पान की उत्पत्ति के बारे में प्रचलित है कि जब
ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तो पान को फल जितनी शुद्धता प्रदान की। जब
उन्होंने पान को स्वर्ग से धरी पर भेजना चाहाता तो उसने यह कह कर धरती पर
आने से इंकार कर दिया कि लोग कलियुग में चबाकर इधर-उधर थूक कर उसका निरादर
करेंगे। इसपर ब्रह्मा जी ने पपान को वचनन दिया कि मुंह से निकलने वाली पहली
पीक वह अपनी हथेली पर रोकेंगे और उसका निरादर नहीं होने देंगे। जब जाकर
पान कहीं धरती आया। आज इसी मान्यता के कारण कुछेक लोग पान खाने से पहले
उसके एक कोने से थोड़ा सा टुकड़ा काट कर जमीन पर फेंक देते हैं, तकि पहली पीक
का दोष समाप्त हो जाए और उनके द्वारा थूकी गई पीक ब्रह्मा जी की हथेली पर न
गिरे।
कभी पराक्रम का प्रतीक भी था पान
यह
बात दीगर है कि प्राचीन काल में पान को जहां पूजा व अन्य रीतिरिवाजों पर
शुीा एवं पवित्र मान कर स्वीकारा गया वहीं इसे हिंदू राजाओं द्वारा शौर्य
एवं पराक्रम का प्रतीक भी मान सम्मानित भी किया गया। उस दौर में जब कोई
विशेष मेहमान आता था या कोई उत्सव समारोह सम्पन्न होता, तब सोने-चांदी व
रत्न जड़ित तश्तरियों में पान के बीड़े सजाकर स्वागत का रिवाज उस काल की अपनी
उपलब्धि थी। इसके प्रति पुरुष समाज के अतिरिक्त महिला वर्ग का भी पान के
प्रति आकर्षण आदिकालीन रहा है। पुराने समय में शाही परिवारों द्वारा लड़की
की शादी में कीमती धातुओं द्वारा निर्मित पानदान, सरौंता, चांदी व सोने से
निर्मित पान के पत्ते व सुपारी देहेज में देने का प्रावधान था, जिसकी झलक
आज ीाी कहीं-कहीं देखने को मिल जाती है।
कहा
जाता है कि उस समयकाल में सोमरस की भांति पान आम आदमी के प्रयोग की वस्तु
नहीं था, इसका प्रयोग मात्र उच्चवर्गीय व राजघरानों तक ही सीमित था।
सामान्य जनमानस के लिए इसका उपल्बध न होना या प्रतिबंधित किया जाना इसकी
पैदावार पर निर्भर था। उस समय लागत व मेहनत अधिक और उपज कम होने के कारण
इसकी खेती एक विशेष वर्ग जिसे बरई कहा जाता था वहीं लोग किया करते थे। और
ये लोग पान की खेती केवल राजघरानों या सुल्तानों के लिए ही करते थे।
मुमताज ने शुरू किया पान में चूना लगाना
जिस
तरह पानी की खेती करने वाले को बरई कहा जाता था उसी तरह उस जमाने में पान
लगा कर राजाओं देने वाले पनहेरी या पनवाड़ी कहा जाता था। ये पनवाड़ी आज की
भांति पान में तरह-तरह की सामग्रियां नहीं डालते थे। बल्कि उस समय पान का
बीड़ा बनाते समय इसमें सुपारी, कत्था, इलायची, सौंफ या लौंग ही डाली जाती
थी। आज की तरह इसमें चूना नहीं लगाया जाता था। धीरे-धीरे समय बदलता गया और
पान खास से आम बन गया। इतिहासकारों के मुताबिक मुगलबादशाह शाहजहां की बेगम
मुमताज ने पान के पत्ते पर कत्थे के साथ चूना लगाने की विधि ईजाद की।
आज
पान का दायरा इतना बढ़ चुका है कि हिंदुस्तान के बाजारों में कई नामों-
बनारसी, मगही, सौंगी, बंगला, मीठा, जगन्नाथी आदि किस्मों के पान उपलब्ध है।
इन्हीं किस्मों के हिसाब से पान की किमत भी तय होती है
पान उत्पादक राज्य
पान
का उत्पादन करने वाले प्रमुख्य राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड,
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्टरा, असम, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू व केरल आदि
है।औषधीय गुणों से परीपूर्ण है पान
.लक्ष्मी नाराण आयुर्वेिदक कॉलेज अमृतकर के प्रोफेसर अरविंदर श्रीवास्त कहते हैं िक पान में िमला तत्व जैसे चूना, सुपारी,
लोंग इलाइची, केसर, जायफल, जावित्री, पेपरमेंट गुलकन्द, सौंफ आदि सभी
आयुर्वेद के मुतािबक मानव स्वास्थ्य के लिए गुणकारी है। इसके अलावा पान
पाचन में सहायकए मामोत्तेजकए सूजनए मूंह के छालेए भूख बढानेए अल्सर से
मुक्ित दिलानेए मूत्र संबंधी बीमािरयों को दूर करनेए खांसीए जुकामए किडनी व
पायरिया आदि रोगों में गुणकारी तो है ही इसके साथ त्वचा को निखारने में
भी काम आता हैा वे कहत हैं आयुर्वेद के प्रसिद्ध ऋषि बाग्भट जी ने अपने
प्रसिद्ध ग्रन्थ श्अष्टांग संग्रहश् मुख सुगन्धित रखने व प्रसन्नता की
वृद्धि के लिए लोंगए कपूरए चुना व खदिर से युक्त पान के सेवन का उल्लेख
किया हैद्य
पान की खेती के िलए उत्तम जलवायु
गाजीपुर
िजला उद्यान अधिकारी डॉक्टर वार्मा के अनुसार अच्छे पान की खेती के लिये
जलवायु की परिस्थितियां एक महत्वपूर्ण कारक हैं। इसमें पान की खेती के लिये
उचित तापमानएआर्द्रताएप्रकाश व छायाएहवाए िमट़टी आदि महत्तवपूर्ण कारक
हैं। ऐसे भारतवर्ष में पान की खेती आसामएमेघालयए त्रिपुरा के पहाडी
क्षेत्रोंए केरल के तटवर्तीय क्षेत्रों के साथ.साथ उत्तर भारत के गर्म व
शुष्क क्षेत्रोंए कम वर्षा वाले कडप्पाए चित्तुरए अनन्तपुर ;आ0प्र0द्ध
पूनाए सताराए अहमदनगर ;महाराष्ट्रद्धएबांदाए ललितपुरए महोबा ;उ0प्र0द्ध
छतरपुर ;म0प्र0द्ध आदि क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक की जाती है। पान का
बेल तापमान के प्रति अति संवेदनशील रहता है। पान के बेल का उत्तम विकास उन
क्षेत्रों में होता हैए जहां तापमान में परिवर्तन मध्यम और न्यूनतम होता
है। पान की खेती के लिये उत्तम तापमान 28.35 डिग्री सेल्सियस तक रहता है
।इसके साथ ही अच्छी रोशनी व उत्तम छाया की आवश्यकता पडती है। सामान्यतः
40.50 प्रतिशत छाया तथा लम्बे प्रकाश की अवधि की आवश्यकता पान की खेती को
होती है। अच्छे प्रकाश में पान के पत्तों के क्लोरोफिल का निर्माण अच्छा
होता है। फलतः पान के पत्ते अच्छे होते हैं व उत्पादन अच्छा होता है।
डॉक्टर वर्मा कहते हैं िक अच्छे पान की खेती के लिये अच्छी नमी
का होना जरूरी है। वे कहते हैं के पान के वेलों कीबृद्वि आम मौसम की
अपेक्षा वर्षात में अधिक होती है। इसका मुख्य कारण उत्तम आर्द्रता का होना
है।
बलुई दोमट मिट़्टी में करें रोपाई
उद्यान
अिधकारी के अनुसार पान की अच्छी खेती के लिये महीन िमट्टी अत्यन्त लाभदायक
होती है। वैसे पान की खेती देश के विभिन्न क्षेत्रों में बलुईए दोमटए लाल व
एल्युबियल मृदा व लेटैराईट मृदा में भी सफलतापूर्वक की जाती है। पान की
खेती के लिये उचित जल निकास वाले प्रक्षेत्रों की आवश्यकता होती है। प्रदेश
में पान की खेती प्रायः ढालू व टीलेनुमा स्थानों पर जहां पानी निकास की
उत्तम व्यवस्था होए में की जाती है। पान की खेती के लिये 7.7ण्5 पी0एच0 मान
वाली मृदा सर्वोत्तम है। वे कहते हैं िक देश में पान की खेती अलग.अलग
क्षेत्रों में कई विधियों से की जाती है। जेसे. तटवर्तीय क्षेत्रों में
नारियल व सुपारी के बागानों मेंए जबकि दक्षित भारत में पान की खेती खुली
संरक्षण शालाओं में की जाती है। जबकि उत्तर भारत में पान की खेती बंद
संरक्षण शालाओं में की जाती हैए जिसे श्बरेजा या भीटश् कहा जाता है।
खेती की विधि
पान
की अच्छी खेती के लिये जमीन की गहरी जुताई कर भूमि को खुला छोड देते हैं।
उसके बाद उसकी दो उथली जुताई करते हैंए फिर बरेजा का निर्माण किया जाता है।
यह प्रक्रिया 15.20 फरवरी तक पूर्ण कर ली जाती है। तैयार बरेजों में फरवरी
के अन्तिम सप्ताह से लेकर 20 मार्च तक पान बेलों की रोपाई पंक्ति विधि से
दोहरे पान बेल के रूप में की जाती है उल्लेखनीय है कि पान बेल के प्रत्येक
नोड़ पर जडें होती हैए जो उपयुक्त समय पाकर िमटटी में अपना संचार करती हैं ।
बीज के रोपण के रूप में पान बेल से मध्य भाग की कलमें ली जाती हैए जो रोपई
के लिये आदर्श कलम होती है। पान की बेल में अंकुरण अच्छा हो इसके लिये पान
के कलमों को घास से अच्छी प्रकार मल्चिंग करते हुये ढकते हैं।
चूंकि
मार्च से तापमान काफी तेजी से बढता है। अतः पौधों के संरक्षण हेतु पानी
देकर नमी बनायी जाती हैए जिससे कि बरेजों में आर्द्रता बनी रहे। पान बेल के
अच्छे प्रवर्द्वन हेतु बेलों के साथ.साथ सन की खेती भी करते हैंए जो पान
बेलों को आवश्यकतानुसार छाया व सुरक्षा प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि
पान के बेलों को यदि संरक्षित नही किया जाता हैए तो बेलों में ताप का शीघ्र
असर होता है व बेले में सिकुडन आती है व पत्तियां किनारे से झुलस जाती हैए
जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। अतः पान की अच्छी खेती के लिये सावधानी
और अच्छी देखभाल की अत्यन्त आवश्यकता होती है। डॉ वर्मा कहते हैं िक अच्छी खेती के लिये पंक्ति से पंक्ति की उचित दूरी रखना
आवश्यक है। इसके लिये आवश्यकतानुसार पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30×30 सेमी0
या 45×45 सेमी0 रखी जाती है।
इस तरह दें पान के बेलों को सहारा
.पान
की खेती के लिये यह एक महत्तवपूर्ण कार्य है। पान की कलमें जब 6 सप्ताह की
हो जाती है तब उन्हें बांस की फन्टीएसनई या जूट की डंडी का प्रयोग कर
बेलों को ऊपर चढाते हैं। 7.8 सप्ताह के उपरान्त बेलों से कलम के पत्तों को
अलग किया जाता हैए जिसे श्पेडी का पानश् कहते है। बाजार में इसकी विशेष
मांग होती है तथा इसकी कीमत भी सामान्य पान पत्तों से अधिक होती है। इस
प्रकार 10.12 सप्ताह बाद जब पान बेलें 1ण्5.2 फीट की होती हैए तो पान के
पत्तों की तुडाई प्रारम्भ कर दी जाती है। जब बेजें 2ण्5.3 मी0 या 8.10 फीट
की हो जाती हैए तो बेलों में पुनः उत्पादन क्षमता विकसित करने हेतु उन्हें
पुनर्जीवित किया जाता है। इसके लिये 8.10 माह पुरानी बेलों को ऊपर से
0ण्5.7ण्5 सेमी0 छोडकर 15.20 सेमी0 व्यास के छल्लों के रूप में लपेट कर
सहारे के जड के पास रख देते हैं व मिटटी से आंशिक रूप से दबा देते है व
हल्की सिंचाई कर देते हैं।
ऐसे करें िसंचाई
प्रति
दिन तीन से चार बार ;गर्मियों मेंद्धव जाडों में दो से तीन बार सिंचाई की
आवश्यकता होती है। जल निकास की उत्त व्यवस्था भी पान की खेती के लिये
आवश्यक है। अधिक नमी से पान की जडें सड जाती हैए जिससे उत्पादन प्रभावित
होता है। अतः पान की खेती के लिये ढालू नुमा स्थान सर्वोत्तम है।
राज्य सरकार देती है 50 प्रतिशत अनुदान
उद्यान
अधिकारी डा वर्मा कहते हैं यदि हम गाजीपुर जिले की बात करें तो करीब पांच
छह साल पहले किसान पान की खेती का प्रशिक्षण लेने के लिए कुछ बागवान आते
थेए लेकिन कोई नहीं आता। पान की खेती को प्रोत्साहन देने के िलए बागवानों
को राज्य सरकार की ओर से 50 प्रतिशत छूट दी जाती है। अगर चाहें तो इच्छुक
िकसान पान रिसर्च सेंट महोबा से संपर्क कर सकते हैं। सरकार द्वारा वहा
बागवानों को प्रशिक्षण भी दिया जाता हैा
पान मसाला व गुटके ने कम की मांग
पान
के व्यवसाय से जुडे लोगों का कहना है िक पान के कारोंबार को मान मसाला
गुटकों ने प्रभावित कर दिया है। इसके साथ सरकार की ओर से मंडीकरण की सही
व्यवस्था न होना भी इसे प्रभावित कर रही है। पाकिस्तान से करोंडों रुपये
का सालाना पान का कारोबार करने वाले व्यापारियों का कहना है कि मान मसाले
का असर भारतीय बाजार में ही नहीं बल्िक अन्तरराष्टरीय बाजार में भी पान
के कारोबार को प्रभावित कर रही है! एक अनुमान के मुताबिक साल 2000 में पान
का कुल कारोबार 800 करोड रुपये का था। जो सरकारी अनदेखी के कारण घट कर 50
प्रतिशत से भी कम रह गया है। 





