कोरोना; कमरे में कैद जि़दगी और सूनी सड़कें

पंजाब पुलिस द्वारा जारी किया गया जागरूकता पोस्‍टर।
दुर्गेश मिश्र
कोरोना वायरस कहें या कोविड 19 ।  इसके प्रकोप से आज पूरी दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है।  वे देश भी इस महामारी के आगे घुटनों पर हैं जो अणु बम होने का दंभ भरते थे।  ईश्‍वर की सत्‍ता को चुनौती देने वाले  मनुष्‍य की जब सभी युक्ति विफल हो जाती है तो वह असहाय हो नीली छतरी वाले की ओर देखता है।  आज कुछ ऐसा ही दुनिया तमाम मुल्‍कों का है।  
पंजाब पुलिस द्वारा जारी पोस्‍टर।
 विज्ञान में विश्‍वास रखने वाले शायद ही इस ईश्‍वर और ईश्‍वरीय शक्ति पर भरोसा करें।  लेकिन इतना तो सत्‍य है कि जब प्रकृति कुपित होती है तो वह किसी न किसी रूप में अपना गुस्‍सा उतारती है।  हड़प्‍पा, मोहनजोदड़ा और बेबीलोन जैसे पुरानी सभ्‍यताएं ऐसे ही नष्‍ट नहीं हो गईं।  इनके पीछे भी कोई न कोई कारण अवश्‍य रहा होगा।  चाहे वह बहुत बड़ा जलजला हो या सुनामी जैसा जल प्रलय। कुछ तो अवश्‍य रहा है। 
अब बात करें, चीन के बुहान से उठी इस महामारी का।  कोई कहता है कि यह बीमारी चमगादड़ जैसे जीव के खाने से फैली है तो कोई इसे चीन की प्रयोगशाला में तैयार जैविक हथियार बता रहा है।  अब सवाल यह उठता है कि चाहे यह जैविक हथियार की तैयारी हो या बीमारी।  नुकसान तो जीव जगत का हो रहा है।  पूरी दुनिया में अघोषित कर्फ्यू का माहौल है।  कल कारखाने बंद हैं, सड़कें सूनी हैं। लोगों घरों में दुबके हुए हैं।  यानी जिंदगी एक तरह से दरिचों से झांक रही है।  इस बंद का असर देश दुनिया की अर्थ व्‍यवस्‍था पर तो पड़ ही रहा।  इस बीमारी से पशु-पक्षी भी प्रभावित हो रहे हैं।  

श्री रामचरित मानस में गोस्‍वामी तुलसी दास जी ने लिखा है- 
  पर संपदा बिनासि नसाहीं ।   जिमि ससि हति  हिम उपल बिलाहीं ।।
दुष्‍ट उदय जग आरति हेतु ।   जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ।।
 संत उदय संतत सुखकारी ।   बिस्‍व सुखद जिमि इंदु तमारी ।।
 परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा ।   पर निंदा सम अघ न गरीसा ।। 
हर गुरु निंदक दादुर होई।  जन्‍म सहस्‍त्र पाव तन सोई।। 
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि।  जग जनमइ बायस सरीर धरि।।
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी।  रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
होहिं उलूक संत निंद रत। होह निसा प्रिय ग्‍यान भानु गत।।
सब कै निंदा जे जड़ करहीं।  ते चमगादुर होई अवतरहीं।। 
सुनहु तात अब मानस रोगा।  जिन्‍ह ते दुख पावहिं सब लोगा।। 
मोह सकल ब्‍याधिन्‍ह कर मूला।  तिन्‍ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
काम बात कफ लोभ अपारा।  क्रोध पित्‍त नित छाती जारा।।
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई।  उपजइ सन्‍यपात दुखदाई।।
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना।  ते सब सूल नाम को जाना।। 

बेशक गोस्‍वामी जी ने आज से करीब साढ़े चार सौ साल पहले जिस संदर्भ में लिखी हो, लेकिन आज जो हालात बने हैं या बन रहे हैं उस परिस्थित यह चौपाई एकदम सही है।  दूसरे शब्‍दों में यह भी कह सकते हैं कि उन्‍हें पहले ही इस महामारी की 'भविष्‍यवाणि' कर दी थी।  

गांवों में जिंदी जैसे तैसे चल रही।  जैसे आज से बीस साल पहले चला करती थी।  लेकिन, सबसे बुराहाल शहरों में रहने वाले लोगों का है।  गलियों में घूमने वाले पशु पक्षी भूख से बिलबिला रहे हैं। अब जरा सोचिए इसके लिए जिम्‍मेदार कौन है। 

कुछ दिन पहले, खबर आई थी कि गंगा और यमुना सहित देख की तमाम नदियों का पानी निर्मल हो गया है।  जालंधर से हिमाचल प्रदेश की पर्वत मालाएं दिखने लगी हैं।  दिल्‍ली का प्रदूषण कम हो गया है।  ओजोन परत के छिद्र भरने लगे हैं।  लाखों करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजू जो काम हम नहीं कर पाए वह काम प्र‍कृति ने कर दिखाया।  वह भी मात्र एक माह के लॉकडाउन में।  

एक बार जरा गौर से सोचिएगा। मानव सभ्‍यता के विकास के लेकर आज तक हमें कुदरत को दिया ही क्‍या है।  शिवाए लेने या उसका अंधाधुंध दोहन करने के अतिरिक्‍त।  हिंदू धर्मशास्‍त्रों में कहा गया- प्रकृति से उतना ही लो जितना की आवश्‍यकता है।  धर्मशास्‍त्रों में सूर्य, चंद्रमा, नदी, समुद्र, पृथ्‍वी व वनस्‍पतियों की पूजा का विधान यूं नहीं हैं।  क्षणभर के लिए इसे अपवाद जरूर मान सकते हैं। लेकिन यह क्षणभंगूर नहीं है।  

  मानव जिस विकास के रथ पर सवार हो कर प्रकृति को चुनौति दे रहा है उसका परिणाम तो घातक होना ही है।  कोरोना से अब तक दुनियाभर में 2.72 लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं।  जबकि 1.33 लाख से अधिक लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं।  इसलिए प्रकृति से खिलवाड़ न करो।