थोड़ा-थोड़ा बुद्ध तो हम सभी में है
वैशाख
माह की पूर्णिमा को बुद्ध को बोधित्व प्राप्त हुआ था। सिद्धार्थ से बुद्ध
बने गौतम बुद्ध को रात्रि के प्रथम प्रहर में शुन्य का साक्षात्का हुआ था।
जिसे पाने के लिए वह महलों का सुख छोड़वर्षों तक कंटक पथ पर चलते रहे। न
जाने कहां-कहां भटके। कितने दिन तक उपवास रहे। सत्य की खोज में हठयोग तक कर
बैठे। लेकिन गया में उरूवेला के तट पर पीपल केनीचे ध्यान मग्न बैठे
संन्यासी को देवता समझ कर सुजाता ने उनके हाथों पर खिर का कटोरा रख दिया,
जिसे उन्होंने प्रसाद समझ कर ग्रहण किया और उसी रात उन्हें वह ज्ञान मिला
जिसे पाने के लिए वह भट रहे थे। गौतम से गौतम बुद्ध बने सिद्धार्थ को पहली
बार पता चला की शरीर को दुख देने मात्र से ही सत्य की खोज नहीं हो सकती।
अर्थात शरीर वीणा की तार की तरह है, इसे उतना ही तानो जिससे मधुर झंकार
निकल सकती है। अधिक खिचने पर वह तार टूट भी सकता है। इसी तरह शरीर भी है।
बुद्ध
ने कितने सुंदर धर्मचक्र का रेखांकन किया है। चक्र घूमता है मगर चक्र का
मूल स्थिर है जो ‘निर्वाण‘ है। चक्र के आठ भाग कितनी साधारण बात करते हैं।
तथागत के नजरिए देखें तो हम जो सोचते हैं वहीं हम हैं- स्पष्ट विचार
दृढ़चरित्र में सहायक है, शुद्ध भाषा- हमार अच्छा व्यवहार-दूसरों के नुकसान
पर व्यापार निंदनीय- दूसरों के लिए सदव्यवहार-विचार, शब्द और कार्य में
सामंजस्य-एक समय में एक ही वस्तु या विचार पर ध्यान। बुद्ध के कहे का अपार
ज्ञान उपलब्ध है, जिसे शब्दों में पिरोना असंभव है। मगर उस सभी के मूल है
अहिंसा और ध्यान।
तथागत ने एक बड़ी बात और कही है। वह है जीवन
और मृत्यु का चक्र। जिस जीवन और मृत्यु का रहस्य जानने के लिए राजकुमार
सिद्धार्थ अपनी पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़ कर रात के अंधेरे में
घर छोड़ा था उस सत्य को बुद्ध ने पा लिया था। अब वह गौतम गौतम नहींरहेऔर ना
ही वह पीपल का पेड़ साधारण पीपल। वह तो भगवान बन चुके थेभगवान बुद्ध! और
पीपल बोधि वृक्ष!
वे कहते है-ं आंनंद! जन्म और मृत्यु का कारण
हम स्वयं हैं। क्योंकि हम पुर्नजन्म की इच्छा रखते हैं। इसलिए बार-बार धरती
पर जन्म लेते हैं और बार-बार मरते हैं। क्यों न हम इस इच्छा का त्या ग कर
शून्य में जीएं। आवा गमन का चक्र ही खत्म कर दें। तभी तो गया में ज्ञान
प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध सारनाथ पहुंचे और यहां पर अपना पहला उपदेश
दिया- जिसमें उन्होंने अपने शिष्यों को चार आर्य सत्य बताए।
उन्हाोंने
कहा-इस दुनिया में दुखः ही दुखः है। जन्म लेना, बूढ़े होना, बीमारी में,
मौत में, प्रीयजनों सेविछुड़ने में ,पसंद-नापसंद की चीजों अर्थात जिवन से
मृत्यु तक दुखः ही दुखः है। इसलिए किसी वस्तु की इच्छा मत रखों।
उन्होंनेअपने अनुयायीयों को सदैव मध्यम मार्ग अपनाने की सीख दी।
हिंदू धर्म में भी बुद्ध
माना
जाता है कि वेशाख पूर्णिमा को ही भगवान विष्णु ने अपने नवें अवतार के रूप
में जन्म लिया। यह नौवां अवतार था भगवान बुद्ध का। इसी दिन को सत्य विनायक
पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के बचपन के
दोस्त सुदामा गरीबी के दिनों में उनसे मिलने पहुंचे। इसी दौरान जब दोने
दोस्त साथ बैठे थेतो कृष्ण ने सुदामा को सत्यविनायक व्रत का विधान बताया
था। सुदामा ने इस व्रत को विधिवत किया और उनकी दरिद्रता दूर हो गई। इसदिन
धर्मराज की पूजा करने की भी मान्यता है। कहा जाता है कि सत्यविनायक व्रत से
धर्मराज खुश होतेहैं। माना जाता है कि धर्मराज मृत्यु के देवता हैं इलिए
उनके प्रसन्न होने से अकाल मौत का डर कम हो जाता है। कुल मिला कर
यूं कहें कि थोड़ा-थोड़ा बुद्ध हममें भी हैं, बस हम उन्हें पहचान नहीं पा
रहे हैं। तो अब हमेंस्वयं की शरण में जाना होगा, आत्मा की शरण में जाना
होगा। तभी तो साधक कहते हैं-‘बुद्धम शरणम् गच्छामि, धम्म शरणम् गच्छामि।।‘