नोटा जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद

                                 नोटा जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद

नवीन कुमार
 मेरे विचार से भारतीय चुनाव सांसदीय प्रणाली ना होकर प्रधानमंत्री का हो कर रह गया है। हमने संसदीय निर्वाचन प्रणाली को प्रधानमंत्री का चुनाव बना दिया। एक  दिन में नहीं हुआ लोगों के मन में इस कदर एक ही बात को बार-बार भरा गया। इसका असर सोचें क्या हो सकता है।  एक अकल्पनीय। इतना भयानक जो हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली को समाप्त कर देगा।  हमारे संविधान रचयिता की सारी मेहनत पर पानी फेर देगा। एक ऐसे अंधकार की ओर ले जाएगा जहां से हम फिर लौट कर नहीं आएंगे।
मैं इस कदर सोच कर अचंभित हो जाता हूं और खुद मानने लगता हूं कि हमारे देश में प्रधानमंत्री का चुनाव हो रहा है । लोकतंत्र में यह संभव भी है। हम कई देशों का उदाहरण ले सकते हैं।  हम प्रधानमंत्री को सीधे तौर पर चुन सकते हैं, लेकिन हमारे संविधान रचयिताओं ने संसदीय प्रणाली को ही क्यों चुना। हमें संसद को चुनने का अधिकार क्यों दिया। फिर सांसद को प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार क्यों दिया । उन्हें राष्ट्रपति चुनने का अधिकार क्यों दिया। उन्हें कानून बनाने और संसद में बहस करने  या चर्चा करने का अधिकार क्यों दिया।  उनके पास दूरदर्शिता नहीं थी क्या, वह वास्तव में उस ढंग से नहीं सोच सकते थे जो आजकल नेता और मीडिया सोचती है।  आजकल के मीडिया कर्मियों और नेताओं को उस समय जन्म लेना चाहिए। उन्हें ही संविधान बनाने की जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए। कहना चाहिए था कि वर्ष 2014 में जो नेता आएंगे और उसके साथ जो मीडिया आएगा वह संविधान बनाएंगे हालांकि उनको यह भी अधिकार उन्होंने दिया था दिया है वह अपने अनुकूल संविधान में फेरबदल कर सकते हैं।  कभी रहे हैं जो उनको अच्छा न लगे उन्हें  बदल दे जिन से वोट बैंक हासिल हो ऐसे सैकड़ों उदाहरण  मैं दे सकता हूं।  कांग्रेस- भाजपा, यहां तक कि बीपी सिंह ने भी अपने अनुकूल संविधान को बदला और पूरा मरोड़ा है।  इस कदर  कि महात्मा गांधी और जवाहरलाल हाजिर होने लगेंगे। आज सवाल यह है कि हम एक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को क्यों चुनते हैं कुछ जगहों पर तो मुख्यमंत्री को ही चुनने लगे हैं।  मंत्री को भी चुनने लगे हैं उम्मीदवार के समर्थक बड़े आराम से यह बोल रहे हैं कि हल्ला कैंडिडेट को जीता दो तो वह सरकार में मंत्री बन जाएगा फिर लोग प्रति लोग सपने दिखाने और खरीदने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है भारतीय समाज इस सपने में अभी भी कोसी नदी की बाढ़ में बहे जहां 70 साल के बाद भी हर साल सैकड़ों परिवार को अप्लाई करने के लिए मजबूर होना पड़ता है लेकिन सूतक नहीं बोलते हैं। अब तो इसे अपनी नियति समझ रहे हैं ।
    बिहार को समझने के लिए दिनेश कुमार मिश्र की किताबों को अवश्य पढ़नी चाहिए इसके अलावा फणीश्वर नाथ रेनू को भी पढ़ सकते हैं किस कदर आतंकी नदी हर साल धान कारोबार परिवार को लील रही है हर साल लाखों लोगों को कि खून पी रही है लोग अपनी बलि तो दे ही रहे हैं अपने एक 2 साल के बच्चों को सुपुर्द कर रहे हैं।  गर्भवती महिलाएं अपनी गर्म दे रही है लोगों की मां तुम्हें अपने बच्चों को 100 पर ही हूं खा लो पेट भर लो उसे आस है पांडव आएगा उसमें से भीम जैसा एक वरिष्ठ होगा और फिर हमें अपने बच्चों को बलि नहीं देनी होगी।
     दिनेश कुमार मिश्र ने अथक परिश्रम कर इसी को बताया है उसी से लेकर कमला और बागमती के विस्तृत रूप को उन्होंने दर्शाया है रिसर्च किया है और लिखा है फिर लौट कर आता हूं अपने मूल विषय पर उदाहरण के तौर पर समझें अगर चपरासी साहेब मास्टर साहब का काम करने लगे तो क्या होगा उसी प्रकार हम हैं हमारा काम एक सांसद को चुना है ना कि प्रधानमंत्री को चुनना जो हमारा काम है। हम उसके बारे में सोचें गीता से लेकर बुध कुरान से लेकर बाइबल तक सभी को पढ़िए उसमें साफ तौर पर कहा गया है कि अपना काम है कर्म करना हमारा हमारा काम है एक निष्पक्ष संसद को चुनना चाहे वह निर्दलीय ही क्यों ना हो उनका काम है । प्रधानमंत्री को छूने उनके अधिकार का हनन क्यों करें संविधान ने हमें अधिकार दिया है। वोट करने का संसद को चुनने का नहीं तो संविधान में अधिकार हमें नहीं देती कि कोई निर्दलीय भी खराब हो सकता है यही हमारे लोकतंत्र की खूबी है और ताकत भी लेकिन मीडिया ने इसे कुछ दिनों से प्रधानमंत्री बनाम प्रधानमंत्री बना दिया है जो जो आपके अधिकार का हनन है अब तो हमारे पास नोटा का भी ऑप्शन है।  कुछ मीडिया कर्मी पैसे लेकर अपने अधिकार का हनन कर रहे हैं।  अपनी बीवी बेटे का पेट पाल रहे हैं और आप को अंधकार में धकेल रहे हैं समय रहते सचेत हो जाएं अपने दायित्वों को समझे और एक संसद को चुने नहीं तो नोटा का उपयोग करें जो आपका अधिकार है।  इतना नोटा दवा है कि सरकार सोचने को मजबूर हो जाए कि एक निष्पक्ष व्यक्ति को ही टिकट दे नहीं तो नोटा जिंदाबाद नोटा जिंदाबाद नोटा जिंदाबाद।