दुर्गेश मिश्र

गाजीपुर जिले के विकास पुरुष कहे जाने वाले मनोज सिन्हा की एक लाख से अधिक मतों से हार कोई अप्रत्याशित हार नहीं थी। यह आंजादा 2014 के हुए लोकसभा चुनाव में ही लगया था। जब, मनोज सिन्हा ने अपने प्रतिद्वंद्वी सपा प्रत्याशी शिवकन्या कुशवाहा को मात्र 30 हजार वोटों से हराया था उसी समय यह तय हो गया था कि 2019 में यह मुकाबला टफ होगा।
यदि गाजीपुर के विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो इस संसदीय क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र गाजीपुर सदर, जंगीपुर, सैदपुर, जखनिया और जमानिया के मतदाता सांसद चुनते हैं। इनमें जंगीपुर और सैदपुर में समाजवादी पार्टी के विधायक हैं तो जखनिया में सुभासपा के विधायक, जबकि गाजीपुर सदर और जमानिया विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के विधायक हैं।
19 मई को मतदान और 23 मई को हुए मतगणना पर नजर डालें तो केंद्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सपा-बसपा गंठबंधन प्रत्याशी अफजाल अंसारी से हर जगह पीछे रहे हैं। मतगणना के पहले चरण में हीं सिन्हा अंसारी से करीब चार हजार से अधिक वोटों से पीछे चल रहे थे और 24वें चरण के आते-आते यह आंकड़ा एक लाख से अधिक मतों को पार कर गया। लेकिन इससे भी चौंकाने वाली सच्चाई तो यह रही खुद गाजीपुर सदर की भाजपा विधायक संगीता बलवंत के क्षेत्र में ही मनोज सिन्हा को किसी बूथ पर दो तो किसी पर पांच वोट मिले।
हर बूथ पर पिछड़े मनोज

गाजीपुर सदर विधानसभा के बूथ संख्या 318 की बात करें तो यहां गठबंधन प्रत्याशी को 550 वोट मिले हैं तो भाजपा को महज पांच वोट मिले हैं। इसी तरह बूथ संख्या 10 पर अफजाल अंसारी को 340 वोट मिले तो मनोज को महज 12 वोट मिले हैं। कुछ यही हाल सदर विधनसभा के सभी बूथों का हला रहा किसी बूथ पर मनोज को अफजाल से अधिक वोट नहीं मिला।
जिस जंगीपुर को बाजार दिया वहीं नहीं मिला वोट
गाजीपुर जनपद की सबसे बड़ी सब्जी मंडी को जिस मानोज सिन्हा ने खाड़ी के देशों से जोड़ा, उसी जंगीपुर विधानसभा क्षेत्र में उन्हें वोट नहीं मिला। यहां के भी वोट पोल का आंकड़ा सदर विधान सभा क्षेत्र के पोलिंग स्टेशनों पर पोल हुए वोटों के जैसा ही रहा। जंगीपुर के बूथ संख्या सात में गठबंध प्रत्याशी को 338 तो भाजपा उम्मीदवार को महज 24 वोट मिले। इसी तरह बूथ संख्या 394 में अफजाल को 440 तो मनोज को मात्र 24 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। कुछ यही हाल जखनिया और सैदपुर विधानसभा क्षेत्रों का भी रहा। जहां मनोज सिन्हा निरंतर पिछड़ते गए और अंत में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
ले डूबा अत्यअधिक उत्साह
जिला भाजा के कुछ पुराने पादाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि गाजीपुर के विकास पुरुष को वर्करों का अत्यअधिक उत्साह ही ले डूबा। नाम न प्रकाशित किए जाने पर जिला भाजपा कार्यालय के वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि नए कार्यकर्ताओं के उत्साह में पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क स्थापित नहीं कर पाई जो हार के प्रमुख कारणों में से एक है। उनका कहना है कि सिन्हा ने गाजीपुर में विकास तो करवाया है। यह किसी से छिपा नहीं है। गाजीपुर का नाम अब देश के नक्शे पर दर्ज हो गया है। यह बात विपक्षी दलों की लीडशिप भी मानती है। कहीं न कहीं चूक हुआ है। इसकी समीक्षा की जाएगी। और गलतियों को सुधारने का प्रयाश किया जाएगा।
जातीय फैक्टर ने डुबाई नाव
पार्टी के पूर्व सहकारिता प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय कार्यालय गाजीपुर के प्रभारी गिरजाशंकर पाडेय सिन्हा के हार का कारण जातीय फैक्टर मानते हैं। उनका कहना है कि 2019 का चुनाव 2014 के चुनाव से एकदम अलग रहा। इस चुनाव में देशभर में जाति आधारित राजनीति खत्म हो गई। लेकिन गाजीपुर की राजनीति अभी भी जातियों में उलझी हुई है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण मनोज सिन्हा जी के हार के रूप में सामने है। पांडे ने कहा कि जिस गाजीपुर में जल, सड़क, रेल और हवाई सेवा की सुविधा मिली उसी गाजीपुर में मनोज का हार जाना न भाजपा को बल्कि गाजीपुर की तरक्की पसंद लोगों को भी अचंभित कर दिया। हर बूथों की समीक्षा कर कमियों को दूर किया जाएगा।
राजपूतों की नाराजगी भी बनी हार का कारण
भाजपा के कद् दावर नेता मनोज सिन्हा के हार के कारण प्रमुख्य कारणों में भितरघात और राजपूत वर्ग वोटरों की नाराजगी भी एक कारण है। क्योंकि सिन्हा पर जातीय राजनीति का आरोप हमेशा से लगता आ रहा है। राजपूतों का आरोप था कि सिन्हा केवल भूमिहारों की ही बात सुनते हैं। और हर वक्त तथा कथित नेताओं से घिरे रहते हैं। खैर मनोज सिन्हा को अपनी पूर्व की गलतियों से सीख लेने की जरूरत है।
पुरानी है राजपूतों और भूमिहारों की लड़ाई
गाजीपुर जनपद में भूमिहारों और राजपूतों के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई कोई नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि इन दोनों जातियों का जंग उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे स्वर्गिय मलापति त्रिपाठी के जमाने से रही है। यह दौर था 1971 का । तब कांग्रेस की सरकार थी। उस दौर में गाजीपुर से कांग्रेस विधायक होते थे वशिष्ठ नारायण शर्मा वह जाति में भूमिहार थे उस जमाने में भी राजपूत वर्ग उनपर जातिवाद का आरोप लगाता रहा। यही नहीं गाजीपुर में हमेशा केंद्र के उलट सांसद होता है। यानी जब केंद्र पं: नेहरू की सरकार होती थी तो यहां से कम्यूनिष्ट के सरयु पांडे सांसद चुन कर जाते थे।
अच्छी हो या बुरी अंग्रेजों ने दी थी पहचान
कुछ लोगों का तो यह भी कहना है गाजीपुर को जो पहचान मिली थी वह अंगेजों की वजह से ही मिली थी। चाहे अच्छी हो या बुरी। क्योंकि अंग्रेजों ने ही गाजीपुर में अफीम का कारखाना लगाया, अंधऊ हवाई पट़टी बनावाई। यानी जहर बोया पहचान भी दिलाई। अंग्रेजी राज खत्म होने के बाद घीरे-घीरे गाजीपुर अपनी पहचान खोता चला गया। और अब जो थोड़ी बहुत पहचान मिली थी वह भी शायद खत्म हो जाएगी। यानी गाजीपुर अपने फिर उसी फटे लिबास में आ जाएगा।