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| अमृतसर के वार मेमोरियल में स्थापित की गई तलवार |
वर्ष 1849 में जब अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा किया (फर्स्ट एंग्लो-सिख युद्ध 1845-1846 के बाद), तो उन्होंने हथियारों के निर्माण और रखने पर सख्त नियम लागू किए। तब भी स्थानीय स्तर पर यह पारंपरिक काम धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से जारी रहा। हलांकि अंग्रेजों के इस एक्ट का पंजाब के हिंदू और सिखों ने जम कर विरोध किया और मोर्चे लगाए। परिणाम स्वरूप ब्रिटिश सरकार ने इन तलवारों का साइज तय किया और कुछ अन्य शर्तों के साथ कहा कि तलवारें उन्हीं के आयुध निर्माण कारखानों में बनेंगी, जिनपर ब्रिटिश सरकार की मुहर लगेगी। इसके बाद सरकार यह तय करेगी कि तलवारें किसको बेची जाएंगी और किसको नहीं। दुर्गेश मिश्र, अमृतसर
"अमृतसर की आवो-हवा में सिर्फ गुरुबाणी का कीर्तन और जायकों
की खुशबू ही नहीं घुलती, बल्कि यहां के जर्रे-जर्रे में फौलाद
की वो खनक भी है, जो सीधे इतिहास और आस्था से जुड़ती है। यह स्वर्ण
मंदिर की चौखट पर माथा टेकने का शहर है, तो उसी मर्यादा की रक्षा
के लिए 'कृपाण' को तराशने का गढ़ भी है।
अमृतसर का तलवार उद्योग सिर्फ लोहे को आकार देने का नाम नहीं है; यह सिखों के गौरव, धार्मिक पहचान, अटूट परंपरा और सदियों पुराने हुनर की एक जिंदा दास्तान है। आज जब आधुनिकता
और नियम-कानूनों की बंदिशें इस पारंपरिक कारोबार के सामने खड़ी हैं, तब भी यहां के कारीगरों की भट्ठियों में सुलगती आग यह गवाही देती है कि यह
धंधा नहीं, बल्कि गुरु की दी हुई वो विरासत है, जिसकी धार वक्त के साथ कभी कुंद नहीं हो सकती।" आईए जानते हैं आस्था और
इतिहास में पगे अमृतसर के तरलवार उद्योग के बारे में।
प्रसिद्ध तलवार निर्माता श्री अमृतसर स्वॉर्ड कंपनी के मालिक
मनमोहन सिंह कहते हैं कि वैसे तो भारत में तलवार रखने और बनाने की परंपरा शदियों पुरानी
है, या यूं कह लें कि सिंधु घाटी की सभ्यता से भी
बहुत पहले से चली आ रही है । मनमोहन सिंह के
मुताबिक वर्ष 1849 में जब अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा किया (फर्स्ट एंग्लो-सिख युद्ध
1845-1846 के बाद), तो उन्होंने हथियारों के निर्माण और रखने
पर सख्त नियम लागू किए। तब भी स्थानीय स्तर पर यह पारंपरिक काम धार्मिक और सांस्कृतिक
कारणों से जारी रहा। हलांकि अंग्रेजों के इस एक्ट का पंजाब के हिंदू और सिखों ने जम
कर विरोध किया और मोर्चे लगाए। परिणाम स्वरूप
ब्रिटिश सरकार ने इन तलवारों का साइज तय किया और कुछ अन्य शर्तों के साथ कहा कि तलवारें
उन्हीं के आयुध निर्माण कारखानों में बनेंगी, जिनपर ब्रिटिश सरकार
की मुहर लगेगी। इसके बाद सरकार यह तय करेगी कि तलवारें किसको बेची जाएंगी और किसको
नहीं। इन शर्तों के साथ अमृतसर मे तलवारें बनाने का कारखाना लगया गया। हलांकि इसके
काफी समय बाद एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) ने अकाली मार्केट में तलवारों
के निर्माण का काम शुरू किया था, जिसपर एसजीपीसी की मुहर लगाई
जाती थी।
*पटियाला में भी होता है तलवारों का निर्माण, अमृतसर की खास पहचान*
अमृतसर के प्रसिद्ध तलवार निर्माता और विक्रेता मनमोहन सिंह
कहते हैं कि पंजाब में तलवारों के निर्माण का काम अमृतसर के अलवा पटियाला में भी होता
है, लेकिन अमृतसर की तलवरों की राष्ट्रीय ही नहीं
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान है। यहां
बनी तलवारों की गुणवत्ता, तलवारों और उसके मुठ पर की गई बारीक
और दिलकश नक्काशी इसके बाकी जगहों की तलवारों से अलग पहचान दिलाती है। अमृतसर धार्मिक
और टूरिस्ट स्पाट होने के कारण पटियाला की अपेक्षा अमृतसर में तलवारों की विक्री अधिक
होती है। हलांकि पार्टिशन से पहले तलवारें
लाहौर में बना करती थीं।
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| श्री अमृतसर स्वॉर्ड कंपनी में तलवार बनाता हुआ कारिगर |
*महाराजा रणजीत सिंह के समय में भी अमृतसर में बनती थीं तलवारें*
प्रसिद्ध इतिहासकार डा. सुभाष परिहार और प्रो. दरबारी लाल के
मुताबिक महाराज रणजीत सिंह के समय में मुख्य हथियार निर्माणा कारखाने लाहौर और अमृतसर
में स्थित थे। इन कारखानें में तलवार, ढाल, बंदूक और तोपें बनाई जाती थी।। हलांकि कि लाहौर
का कारखाना काफी बड़ा थी। जबकि, अमृतसर सिख साम्राज्य का आध्यात्मिक
और व्यापारिक केंद्र होने के साथ-साथ पारंपरिक हथियार निर्माण का गढ़ था। यहां स्थानीय
लोहार, कारिगर उत्कृष्ट किस्म की तलवारें, ढाल और चक्र (निहंगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले हथियार) बनाते थे। इन कारखानों
में 'तलवार', 'शमशीर', 'खंडा', और 'पेशकब्ज' जैसे विभिन्न प्रकार के हथियारों को ढालकर उन पर सोने, चांदी और मीनाकारी का काम किया जाता था।
*हिंदू धर्म में होती तलवारों की पूजा*
तलवारों का संबंध शक्ति और संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। यदि धर्म
और इतिहास की तरफ मुड़कर देखें तो विजय दशमी के दिन हिंदू धर्म से जुड़े लोग शास्त्र
पूजन करते हैं। खास कर राजपूतों में शस्त्र पूजा की परंपरा आज भी है। राजपरिवारों से जुड़े लोग इस दिन तलवारों पर तिलक
लगाते हैं। उन्हे सिद्ध करते हैं और रक्षा सूत्र बांधते हैं। यहां तक कि भारतीय सेना में भी शस्त्रों की पूजा
की जाती है। तलवारों की पूजा मुख्य रूप से रक्षा, न्याय, शक्ति और सम्मान के रूप में की जाती
है। भारतीय संस्कृति में इसके शक्ति और संतुलन
के रूप में देखा जाता है। तलवारों को धर्म की रक्षा और देवी-देवताओं की शक्ति का साक्षात
रूप माना जाता है।
सिख धर्म से भी जुड़ी है तलवार
सिख धर्म में तलवार को पांच ककारों में शामिल किया गया है। यह
अत्याचार के खिलाफ लड़ने , धर्म और
आत्म रक्षा का पवित्र प्रतीक है। मनमोहन सिंह कहते हैं कि 11 जून 1606 में श्री गुरु
अर्जुन देव जी के बलिदान के बाद सिखों के छठवें गुरु श्री हरगोबिंद साहिब जी ने गुरु
गद्दी पर विराजमान होते समय मीरी-पीरी नाम की दो तलवारें धारण की। मीरी जो सांसारिक
सत्ता का प्रतीक और पीरी आध्यात्मिक सत्ता का प्रतीक है। वे कहते हैं, गुरु साहिबान द्वारा दो तलवारें धारण करना पिछले गुरु परंपरा से अलग था। इनसे पहले पांच गुरु केवल अध्यात्मिक शक्ति के प्रतीक
थे। गुरु हरगोबिंद सिंह जी ने मीरी-पीरी धारण कर सिखों के जीवन के दो महत्व पूर्ण पहलुओं
को समझाया।
*गुरु गोबिंद सिंह जी ने पांच ककारों में किया शामिल, नाम दिया कृपाण*
पूर्व जत्थेदार भाई रंजीत सिंह जी कहते हैं कि सिख धर्म के पांच
पवित्र ककारों में से कृपाण एक है। 10वें गुरु
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 ईसवी में वैसाखी के दिन खालसा पथ की स्थापना के समय
सभी अमृधारी सिखों के लिए ककार धारण करना अनिवार्य कर दिया।दिया। मनमोहन सिंह कहते
हैं कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने दोधारी खंडे से अमृतपान शुरू करवाया। उन्होंने ही तलवार
को कृपाण नाम दिया। वे कहते हैं कृपाण दो शब्दों से कृपा+आन से मिल कर बना है। इसे पीछे अवधारणा यह है कि जब भी कृपाण उठेगी धर्म
और मजलूमों की रक्षा के लिए उठेगी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने शस्त्र माला की रचना कर
शस्त्रों की प्रार्थना की है। दशम पातशाह ने अपने अनुयायीयों को पांच ककार धारण करने
को कहा, इनमें से एक कृपाण थी। गुरु जी ने इन्हे पीर
का दर्जा दिया था।
*खंडा विवाह का प्रतीक है तलवार*
डा: ब्रहमा नंद सिंह कहते हैं कि राजपूत काल में खंडा विवाह
होता था। यह विवाह तब होता था जब जारा किसी
युद्ध में गया हो और वह शादी के मंडप में नहीं पहुंच पाता था तो अपनी तलवार भेजता था। जिसके साथ उसकी होने वाली पत्नी फेरे लेती थी, जिसे खंडा विवाह कहा जाता था। हलांकि अब यह चलन नहीं रहा, लेकिन राजपूत काल में यह विवाह का एक हिस्सा था।
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| तलवार पर अरबी में लिखे गए साधक शब्द |
तलवारों पर साधना भी की जाती थीतलवार निर्माता व विक्रेता मनमोहन सिंह कुछ तलवारों को दिखाते
हुए बताते हैं कि इनपर सिद्धियां भी की जाती थीं। इन तलवारों पर फारसी और संस्कृत में
कुछ सिद्धिया भी उकेरी गई हैं। यहां तक कि कुछ तलवारों में छोटे-छोटे छेद किए गए थे
जो बताते थे कि इन तलवारों से कितने युद्ध जीते जा चुके हैं। यहां तक की तरवारों को पर राजवंशों की मुहर लगी
होती थी, ताकि जंग में शहीद होने वाले सैनिक की पहचान
की जा सके।
लुभाती हैं तलवारों पर की गई कारीगरी
तलवार निर्माताओं के अनुसार तलवार की कीमत उसकी मजबूती और उसके
मुठ पर की गई कारीगरी से तय हो ती है। कहा जाता है कि शस्त्र और साहित्य के प्रेमी
राजा भोज अपनी तलवार पर भी कविताएं लिखवा रखी थी। मनमोहन सिंह कहते हैं कि राजपूत राजाओं
के तलवारों की मुठ और म्यान पर हीरे-जवाहरात जड़े होते थे, यहां तक की महाराजा रणजीत सिंह की तलवार की
मुठ पर कई बेशकीमती नगीने लगे होते थे। तलवारों से अधिक कारीगरी खंजरों और कटार पर
की जाती थी। आज भी तलवारों के शौकीन लोग इनकी मुठ पर सोने-चांदी की कारीगरी करवाते
हैं, जिससे इसकी कीमत 400 रुपये चार लाख तक पहुंच जाती है।
हजारों परिवारों को रोजगार दिला रहीं तलवारें*
गुरु नगरी के तलवार निर्माताओं का कहना है तलवार निर्माण कुटिर
उद्योग की श्रेणी में आता है। इसमें सारा काम
हाथ से किया जाता है। तलवार की ब्लेड से लेकर मुठ पर की जाने वाली कारीगरी भी हाथों
से की जाती है। यहां तक की तलवार रखने वाली म्यान लकड़ी और चमड़े से तैयार की जाती
है। इसमें ग्राहकों की मांग के अनुसार सोने और चांदी के तारों की तारकसी भी हाथों से
की जाती है। श्री अमृतसर स्वॉर्ड कंपनी के
मालिक मनमोहन सिंह का कहना है कि तलवार बनाने वालों से लेकर बेचने वालों तक प्रत्यक्ष
और प्रत्यक्ष रूप से 10 हजार से अधिक परिवार इस उद्योग से जुड़े हैं।
*विश्व के कई देशों में निर्यात की जाती हैं अमृतसरी तलवारें*
स्वर्ण मंदिर के आसपार के तलवार विक्रेताओं के अनुसार अमृतसरी
तलवार, खंजर और कटार की मांग पंजाब सहित देश के विभिन्न
राज्यों में तो है ही, साथ दुनिया के कई देशों में भी निर्यात
की जाती है। हलांकि पटियाला की बनी तलवारों
की मांग बहुत कम है। कई लोग तो गिफ्ट के तौर पर भी तलवारें विदेशों में रह रहे अपने
स्वजनों को भेजते है। गुरु नगरी में देश-विदेश
से आने वाले पयर्टक अपने ड्राइंग रूम में सजावट के लिए भी तलवार, कटार, खुखरी आदि लेकर जाते हैं।
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| जगदंबा तलवार |
मराठों को लुभाती हैं भवानी और जगदंबा तलवार*
तलवार निर्माता और विक्रेता मनमोहन सिंह कहते हैं कि अमृतसर
में बनी ‘भवानी’, ‘जगदंबा’
और ‘तुलजा’ तलवारों की महाराष्ट्र
में काफी मांग है। वे कहते हैं कि ये नाम छत्रपति
शिवाजी महाराज की तलवारों के थे। इनमें भवानी
तलवार सबसे अधिक प्रसिद्ध है। मान्यता है कि ये तलवार छत्रपति को मां भवानी से प्राप्त
हुई थी। मनमोहन सिंह के अनुसार महाराष्ट्र से आए कुछ पर्यटकों ने उन्हें भवानी तलवार
सहित जगदंबा और तुलजा तलवारों के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद बाद उन्होंने
वर्ष 2015 में भवानी और जगदंबा तलवार का निर्माण शुरू किया, जिसकी
महाराष्ट्र से सर्वाधिक मांग है।
अमृतसर में बनाए जाने वाले तलवारों के नाम
श्री अमृतसर स्वॉर्ड कंपनी के मनमोहन सिंह कहते हैं कि यदि तलवारों
के आकार-प्रकार की बात की जाए तो भारत के दस प्रसिद्ध तलवारों का निर्माण अमृतर में
किया जाता है। इनमें खंडा, तेगा, गोलिया, कतर, सिरोही, पट्टिसा,
किर्श, धूप और कटरी का निर्माण किया जाता है। तलवारों
की लंबाई की बात करें तो छोटी तलवारें से 20 से 28 इंच, मध्यम
तलवारें 28 से 27 इंच, लंबी तलवारें 38 से 51 इंच, विशाल तलवारें 5 फिट और विशेष तलवारें 60 से 70 सेंटी मीटर के बीच होती हैं।